आइना

औकात

औकात शब्द का जब जिक्र होते ही हमारा ध्यान स्वतः इंसान की आर्थिक यानी उसकी माली हालात पर केंद्रित हो जाता है ।

दरअसल औकात शब्द में निहित अर्थ है मानवता, समाज के लिए उपयोगी सामाजिक थाती अथवा पूंजी में इजाफे और संरक्षण preservation में हमारी जो भागीदारी है अथवा हमारे भीतर इसकी गुप्त सामर्थ्यता capability या संभावना मौजूद है।

यही आपकी असली कीमत या औकात है और इसे नापने का आधार भी यही होनी चाहिए।

पहले से उपलब्ध सामाज के महत्वूर्ण संसाधनों के उपभोग consumption और क्षति के अतिरिक्त जो हम इनके निर्माण में अपना योगदान दे रहे है असल में यही हमारी कीमत है।

आदम समाज की सामूहिक सांझी पूंजी में आर्थिक, भौतिक उपलब्धि के अलावा विशेष तौर पर विज्ञान, साहित्य और कला के क्षेत्र में सेवाओं का सृजन और नवप्रवर्तन inovation भी सामाजिक पूंजी का एक अहम हिस्सा और धरोहर heritage है।

आपमें यदि बौद्धिक intellectual रचनात्मक सृजन creativity की विलक्षण outstanding क्षमता मौजूद है, तो निश्चित रूप से आपकी हैसियत इसे आकने के दूसरे तमाम आर्थिक पैमानों की मोहताज नही है।

क्योंकि इंसानी समाज को दिशा, संतुलन और आकार देने वाले ये जरूरी इनग्रेडिएंट्स हैं।

जिसके समक्ष हैसियत तय करने के अन्य दूसरे सतही पैमाने पूरी तरह से निराधार और औचित्यहिन illogical मालूम होते है।

आर्थिक उपलब्धि इंसान के लिए उपयोगी उत्पाद product को बाजार में बेच धन में तब्दील कर लेने का सिर्फ एक हुनर मात्र है।

दरअसल धन उपयोगिता utility के मान value को संचित store और हस्तांतरित transfer करने का सिर्फ एक साधन है।

क्योंकि अतीत में ऐसे कई महत्वूर्ण शख्स हुए हैं।

जैसे कार्ल मार्क्स, नेलसन मंडेला, महात्मा गांधी जिनके विचारों ने सामाजिक अन्याय और शोषण के विरुद्ध हमें प्रेरित और संगठित कर उस अमुक समस्या से निपटने का हमे मार्ग दिखाया।

और इनके सार्थक विचारों और सिद्धांतों के समक्ष तमाम आर्थिक और राजनीतिक सत्ताए बेबस हो गई।

हालांकि उनके विचार आज भी प्रासंगिक relevant और उपयोगी हैं।

आपकी उपलब्धि इंसानियत के लिए उपयोगी कोई भी सेवा हो सकती है।

यह साहित्य, कला, समाज शास्त्रीय विचारों और दार्शनिक, वैज्ञानिक सिद्धांतों का सृजन हो सकता है।

इनका असल मूल्य इंसान के जीवन में इनकी भूमिका, महत्ता importance प्रभाव influence तय करता है।

जबकि क्षणिक आवश्यकताओं के पोषण और शोषण से संचालित होने वाला बाजार सिर्फ इसकी फेस वैल्यू के आधार पर इसका वास्तविक मूल्यांकन कतई नहीं कर सकता।

क्योंकि इस बाजार के लिए बिना तराशा हुआ हीरा भी एक साधारण कांच के समान है।

अपनी योग्यता के बल पर निसंदेह धन कमाना मुमकिन है लेकिन मात्र धन से इन उपयोगी योग्यताओं को प्रतिस्थापित substitution नहीं किया जा सकता।

क्योंकि तमाम क्रिकेटर्स और फिल्मी हस्तियां अपनी योग्यता की उपयोगिता से हासिल प्रसिद्धि के बूते कई बाजारू प्रोडक्टों का एंडोर्समेंट कर धन जमा कर लेते हैं।

जाहिर है कि यदि आपके अंदर सृजनात्मकता creativity यानी कि प्रोडक्टिविटी का हुनर मौजूद है, इससे बिल्कुल फर्क नहीं पड़ता कि आपने इसे बाजार में भुनाया है या नहीं है।

क्योंकि इसके बावजूद आपमें दूसरे आर्थिक, राजनीतिक सत्ता के समान ही अंतर्निहित मूल्य inbuilt value मौजूद हैं।

जो लोग प्रत्येक इंसान का मूल्यांकन सिर्फ और सिर्फ उनकी फेस वैल्यू से करते हैं। दरअसल वे निहायती बाजारू, सतही और जाहिल किस्म के लोग होते हैं।

जिस प्रकार इंसानी शरीर को चलाने के लिए कई अंग आवश्यक होते है, जबकि कमोबेश सभी महत्वूर्ण है लेकिन, कुछ अंग हमारे निर्वाह के लिए जरूरी है

पर वहीं कुछ अंगो के बिना हमारा जीवन ही संभव नहीं है।

इंसानी शरीर के जैसे ही इंसानी समाज के संचालन में भी कई आवश्यक तत्वों जैसे

आर्थिक या भौतिक उपलब्धि के अलावा वैज्ञानिक, साहित्यिक और आवश्यक सृजनात्मक सेवाओं की एक अहम भूमिका होती है।

इसकी मार्केटिंग करने या ना करने भर से इनकी उपयोगिता पर कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता।

इसका तात्पर्य है कि जो बाजार के समक्ष नहीं है वह आवश्यक नहीं है कि व्यर्थ ही हो।🤔

इसलिए हर इंसान का सम्मान आवश्यक है क्योंकि कोई नहीं जानता कि किस नर में नारायण छुपे हो।

😁😁😍😍

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दवानाल का दर्पण

एक कस्बे में चार दोस्त रहते थे वे सभी हमउम्र थे।

जिसमें से अमीश सबसे बड़ा था जिसका झुकाव अध्यात्म की तरफ अधिक था क्योंकि वह ब्राह्मण था।

दूसरा दोस्त देवेंद्र था जो की औसत प्रतिभा का धनी था उतनी ही बातें को पढ़ता और समझता था जो कि उसके परीक्षा में आते थे वो उन्हीं लोगों से मिलता जुलता था जिनसे उसको आवश्यकता होती थी

वह काफी भाग्यवादी अधिक था उसे ईश्वर के ऊपर बहुत भरोसा था ।

तीसरा दोस्त राजीव जो की स्वभाव से भौतिकता वादी (materialistic) प्रवृत्ति का था उसे आकर्षक कपड़ों जूतों का शौक था।

उसे आकर्षक चीजो से भी अगाध लगाव था उसके जीवन का लक्ष्य एक सेलिब्रिटी के जैसा जिन्दगी जीना था।

चौथा दोस्त अमन जोकि कि एक निर्धन परिवार से था हालाकि उसका लक्ष्य भी एक बड़ा आदमी बनना था लेकिन उसका अप्रोच अव्यवहारिक(Impractical) था क्योंकि उसके दोस्त गिने चुने थे जिस वजह से वह स्वभाव से अंतर्मुखी (introvert) था।

उसका दूसरे व्यक्तियों से संवाद कम होने के कारण उसके विचारों और धारणाओं(Assumptions) में क्रॉस करेक्शन कर उसे परिष्कृत करने की गुंजाइश लगभग समाप्त हो गई ।

चारों दोस्त अलग अलग प्रवृत्ति के होने के बावजूद भी इसलिए मित्र थे क्योंकि वे एक ही मोहल्ले में रहते थे और एक ही स्कूल में पढ़ते थे और उनके बीच एक विशेष समानता यही थी कि उन सभी में एक आग थी वर्तमान से बेहतर जीवन को हासिल करने की हालाकि ये संभव था कि हरेक के ख्वाबों की जिन्दगी का प्रकार, आधार और उद्देश्य अलग अलग हो।

उन चारों की जब मजलिस लगती थी तब राजीव अक्सर किसी एक बड़े सेलिब्रिटी से संबंधित चर्चा छेड़ देता था।

जिसमें राजीव का फोकस उस अमुक सेलिब्रिटी की पर्सनैलिटी और बॉडी लैंग्वेज, महंगी गाड़ियों उसके रुतबे का बखान पर अधिक होता।

जिस पर अमन जोकि खुद स्वभाव से इंट्रोवर्ट था वह उस सेलिब्रिटी के रुतबे को तो स्वीकार करता था पर वह उसके बैकग्राउंड में हुई उसके द्वारा अनैतिक कार्यों और सांठगांठ को अधिक रेखांकित करता था।

उसका मानना था कि जब समाज में इतनी आर्थिक असमानताए हैं तो उस अमुक सेलिब्रिटी को इस तरह की फिजूलखर्ची ना करके उसे गरीबों के उत्थान में उस धन को व्यय कर देना चाहिए।

लेकिन राजीव जोर देकर कहता है कि आदमी जिंदगी में जिस भी मुकाम पर पहुंचता है उसके लिए वह जीवन में जितनी भी समझौते, त्याग, परिश्रम, छल कपट शत्रुता या जुगाड़ करता है तो उसका दुष्परिणाम यदि वह खुद भुगतता है तो उसका शुभ परिणाम भी उसे निजी रूप से भोगने का उसे पूरा अधिकार है।

जिस पर अमिश की टिप्पणी होती थी कि यह सब प्रारब्ध का खेल है यानी पिछले जन्म के कर्मों का फल।

देवेंद्र कहता था कि ये सब बड़े लोगों की बातें हैं हमें तो लाइफ में सिर्फ एक स्थाई सरकारी टाइप नौकरी मिल जाए बाकी दुनिया गई तेल लेने, क्योंकि जब तक हम इंसानों की श्रेणी में बचेंगे तभी न …………..

लेकिन अमन उस उद्धृत व्यक्ति की सक्सेस स्टोरी की तकनीकी बारीकियों का छिद्रंवेशन यानी इंटेलेक्चुअल ऑब्जर्वेशन पर चर्चा करता,

क्योंकि उसका विशेष रूप से मानना है कि जिंदगी में हम कुछ भी हासिल कर सकते है, बशर्ते(Provided)।

हमारे पास अपने इर्द-गिर्द में उपलब्ध संसाधनों और लोगो उचित ढंग से मैनेज करके उपयोग करने का सलीका हो।

इसकी टाइमिंग एक क्रिकेट के बैट्समैन के माफिक एकदम सधी हुई हो।

यहां अमन का अस्पष्ट रुप से संदेश है कि अगर आपका लक्ष्य बड़ा है तो जीवन में मिलने वाले तमाम गैर महत्वपूर्ण लोगो का उपयोग और शोषण करके आगे बढना पूरी तरह से जायज है।

क्योंकि आखिरकार में टोटल आउटपुट ही देखा जाता है, फिर इन गैर जरूरी लोगों के साथ छोटे-मोटे नैतिक सहयोग, सद्भावना, मानवीयता से हासिल परिणाम से बेहतर होगा अगर इनका उपयोग करके आप किसी बड़े मुकाम को हासिल कर जाते है तो फिर इन गैरजरूरी लोगों को सिर पर ढोने से हासिल परिणाम की अपेक्षा आप कहीं ज्यादा समाज, मानवता और परिवार की बेहतरी कर सकते हैं।

लेकिन अमीश की राय थी की

अगर ऐसा है तो हमारे महात्मा, महर्षि क्या नासमझ थे कि उन्होंने हमें सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलने की सलाह दी थी।

इस पर राजीव दखल देते हुए ठसक के साथ कहता है की अगर हम किसी गड्ढे को भरने के लिए उस में मिट्टी डालते हैं तो यह जाहिर सी बात है किसी दूसरी जगह पर गड्ढा करके ही हम इस मिट्टी को लाए हैं परन्तु अगर आप कोई गड्ढा तो कर देते हैं पर उस मिट्टी को उससे भी अधिक महत्वूर्ण जगह पर नहीं भर पाते हैं तब तुम्हारे द्वारा किया गया वह गड्ढा अनैतिक और गलत माना जाएगा क्योंकि

दुनिया परिणाम देखती है तैयारी नहीं।

अमन जो कि एक इंट्रोवर्ट था इसलिए उसे पास घटनाओं यों पर काफी गहन चिंतन था।

लेकिन वह अपनी योग्यताओ को सिर्फ ख्याली दुनिया में ही संजो कर खुशफहमी में जी रहा था।

संकोच, आलस या किसी प्रेरणा के अभाव में उसने अपनी योग्यताओं और योजनाओं को धरातल उतारने की जहमत नहीं उठाई जिससे वह अपनी योग्यता की प्रामाणिकता और इफेक्टिवेनेस को चेक नहीं कर पाया।

उसके भीतर एक छद्म आत्मविश्वास था,

कि जब मौका मिलेगा तो मै झंडे गाड़ दूंगा लेकिन जब जैसे जैसे जिंदगी उसे मौके देती गई वह तमाम मौकों पर वह औंधे मुंह गिरा।

अप्रत्याशित विफलताओं के कारण उसका आत्मिश्वास सून्य होता गया और हताशा की वजह से वह भीतर से टूट गया और उसके लिए मामूली कार्यों में भी डील कर पाना कठिन हो गया ।

राजीव जो कि कई महिला मित्रों के साथ संबंध में रह चुका था,

जब देवेंद्र को किसी लड़की से पहली नजर में प्रेम हो जाता है और वह उसके साथ विवाह करने के फैसले को राजीव के साथ शेयर करता है तो राजीव अपने तजुर्बे के आधार पर अमन को सलाह देता है कि दरअसल जो पहली नजर में प्रेम होता है न वह छद्म प्रेम यानी ह#स होती है।

कई मर्तबा इस टाइप का प्रेम होने के बाद ही विशुद्ध परिष्कृत प्रेम हासिल होता है, यानी कि जैसे-जैसे ये जिस्मानी प्रेम ढलान पर बढ़ता है उसके साथ ही दूसरे रास्ते से रूहानी प्रेम परवान चढ़ता जाता है।

इस तरह से राजीव और कई महिला मित्रों के साथ संबंध में रहने के बाद एक महिला मित्र के साथ लाइफ में सेटल हो जाता है।

जबकि देवेंद्र की राय थी कि

जब इंसान का पेट भरा हुआ होता है तभी उसके मन में इश्क, क्रांति और फिलॉस्फी की बीमारी के होने की गुंजाइश अधिक होती है।

क्योंकि हमारे यहां दुनिया के सबसे आला दर्जे के फिलॉसफर एक तो मुहल्ले के नामी बेवड़े होते हैं वरना फिर फटे हाल नामी कंगाल लोग।

अमन जो कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखता था ।अपनी रुझान के मुताबिक एक लाइफ कोच का प्रोफेशन चुनता है,

लेकिन जब मार्केट से उसे ठंडा रिस्पांस मिलता है तब वह राजीव से संपर्क करता है और राजीव उसे सलाह देता है कि लोग प्रवचन में भी लोग वही बात सुनते हैं ।जो ज्ञान वे अपने आस पड़ोस से। अपना चुके होते है उन्हें तुम्हारा ज्ञान नहीं चाहिए।

आपको उन्हीं का फेवरेट ज्ञान पता लगाकर उनको ही डेंटिंग पेंटिंग करके अपने प्रोफेसनल अंदाज में परोसना एक सफल लाइफ कोच का काम होता है।

तुम्हारा वैदिक ज्ञान वैदिक युग तक ही प्रासंगिक(Relevant) था।

राजीव से सलाह करने के बाद अमन अपने प्रोफेशन के तेवर और कलेवर को बदलता है और खुद को री इन्वेंट करके बाजार में मौजूद संभावनाओं की तलाश करते हुए, अपने प्रोफेशन मैं एक ठीक-ठाक पोजीशन तक पहुंच जाता है।

जबकि राजीव स्वयं अपनी रुचि और ख्वाब के हिसाब से एक बड़ी एमएनसी में एक बड़ा पद हासिल कर के वह एक आलीशान जिंदगी जीने लगता है लेकिन वह अपना पूरा प्रोडक्टिव टाइम दफ्तर के काम में व्यस्त रहता है और फुर्सत के समय में लंबी वैकेशंस पर चला जाता।

उसके बच्चे भी काफी खुश रहते थे क्योंकि उन्हें अपनी जरूरत का सारा सामान आसानी से मिल जाता था, किंतु राजीव ने अपना क्वालिटी टाइम अपने परिवार के साथ कभी बिताता।

कुछ समय बाद उसे इस बात एहसास हुआ कि उसके बच्चे जब तक आर्थिक रूप से उस पर निर्भर थे तभी तक वे उसका सम्मान करते थे जैसे-जैसे उनकी आर्थिक निर्भरता कम होती गई उनका अपने पिता और परिवार के प्रति स्नेह भी सिकुड़ता गया।

क्योंकि उसने कभी अपने बच्चों के साथ निजी जज्बाती क्षण नहीं गुजारे ।

जिससे उनके बीच वह जरूरी आत्मीय लगाव पनप सकता।

जहां परिवार के किसी एक सदस्य को चोट लगने पर दूसरे सदस्यों को भी भावनात्मक दर्द की अनुभूति होती है।

उनके लिए रिश्ते बाजारी मोल भाव में तब्दील हो गए थे।

राजीव का जीवन निराशा और कलह की भेंट चढ़ गया।

अमन जो स्वभावतः एक इंट्रोवर्ट इंसान तो था लेकिन जिंदगी में तमाम विफलता के बावजूद आखिरकार उसे एक सामान्य शिक्षक की नौकरी मिल गई।

और उसकी अरेंज मैरिज हुई, हालांकि उसकी कुछ अनभिज्ञ कमियों के कारण वह अपने मनचाहे मुकाम हासिल नहीं कर सका।

फिर भी उसकी सामाजिक-आर्थिक घटनाक्रमों पर एक बारीक पकड़ थी जिसके कारण उसके बच्चों में घटनाओं के प्रति एक स्पष्ट नजरिया आरंभ में ही विकसित हो गया।

चूकी उसका विवाह अरेंज्ड हुआ था पर यह संजोग था कि उसकी पत्नी एक एक्स्ट्रोवर्ट (बहिर्मुखी) महिला थी।

जो कि उसकी उसके बच्चों के लिए एक संतुलित वातावरण दे पाई।

क्योंकि एक आदर्श जीवन साथी में वो गुण अवश्य होने चाहिए जिन गुणों का दूसरे साथी में अभाव है वरना हमारा जीवन एकांगी हो जाता है।

क्योंकि लव मैरिज में हम अपने हममिजाज व्यक्ति को ही चुनते हैं

जिससे हमारी खामियां और गंभीर हो जाती है।

अभिभावकों में संतुलित तालमेल के फस्वरूप अमन के बच्चों के व्यक्तित्व में वो तमाम गुण विकसित हुए

जो कि एक सफल इंसान के वजूद के लिए जरूरी थे। जिसके बल पर वे अमन के अधूरे ख्वाब कों सच कर पाए।

देवेंद्र जिसके अरमान चाहे संयमित हो लेकिन लक्ष्य व्यावहारिक होने के कारण ठीक-ठाक ढंग से हासिल कर लेता है और उसके बाद समाज और सरकार को दोष देता हुआ अपनी एक सामान्य साधारण जीवन बसर करने लगा।

जिंदगी का काफी पहर बिताने के बाद जब चारों मित्र एक बार फिर मुलाकात करते हैं तो अनायास ही अपनी जिंदगी का मूल्यांकन का जिक्र डाल देते है।

आखिर हम में से किसका जीवन अधिक सार्थक साबित हुआ?

अमीश कहता है कि मेरे नजरिए से अमन हम में सबसे अधिक सफल है ।

क्योंकि जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने कर्ण के रथ को एक ही प्रहार से सौ कदम पीछे धकेल दिया जिसके प्रत्युत्तर में कर्ण ने अर्जुन के रथ को तीन कदम तक पीछे धकेल देते हैं।

तब भगवान श्री कृष्ण कर्ण को शाबाशी देते हैं।

तब अर्जुन का प्रश्न था अरे मैंने तो एक ही प्रहार से उसके रथ को सौ कदम पीछे धकेला दिया था उसने तो मेरे रथ को मात्र तीन ही कदम पीछे धकेला है।

इस पर भगवान श्री कृष्ण का जवाब था।

सबसे पहले तुम यह देखो कि तुम्हारे रथ पर तीनों लोकों का स्वामी साक्षात विराजमान है।

और तुमने सिर्फ कर्ण के रथ को ही धकेला है जबकि कर्ण ने तीनों लोको के स्वामी को तीन कदम पीछे धकेला है।

इसका निष्कर्ष यह है कि एक आरामदायक शानदार अचीवमेंट्स से कहीं अधिक सराहनीय है तमाम दुश्वारियो के बावजूद अपने न्यूनतम संसाधनों के बल पर जीवन में एक असाधारण प्रदर्शन।

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स्त्री का सम्मान

महिला को देवी की तरफ पूजने की कोई जरूरत नहीं है। आप उसको पहले सिर्फ एक इंसान के तौर पर ही स्वीकार कीजिए,
जैसे आप पुरुष सहकर्मियों को उनके निजी गुणों ,अवगुणों और स्वभाव के आधार पर उनके साथ अपने व्यवहार का चुनाव करते हैं।
महिलाओं के साथ भी हमारे व्यवहार का मानक भी वही होना चाहिए।
एक महिला जो संभवतः आप से भी कम सुविधाओं और तमाम सामाजिक, पारिवारिक हतोत्साहन के बावजूद आप के समकक्ष बैठी हैं, इसके बावजूद यदि आप उनके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं तो इसका अर्थ है कि आप की नजरो में संघर्ष और परिश्रम की ना तो समझ है ना ही कद्र।
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शहरीकरण एक साजिश

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महानगरों की इन चमचमाती हुई ऊंची इमारतों को देखकर समृद्धि का भ्रम ना पालें यहां चीजें चाहे कितनी भी व्यवस्थित दिखती हो या फिर कितने ही रोजगार के अवसर मुहैया क्यों न कराती हो दरअसल यह व्यवस्था रोजगार को खत्म करने और सारी समस्याओं का जड़ है देश की सारी पूंजी को कुछ विशेष महानगरों में सरकारों द्वारा साजिशन निवेश कर दिया जाता है जोकि असल में यह देश की गरीब जनता के साथ एक क्रूर साजिश है।
जिसका मुख्य उद्देश्य उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाना और किसानों और मजदूरों का शोषण करना होता है।

कुछ चुनिंदा महानगरों में देश की सारी पूंजी निवेश करने से जाहिर है कि रोजगार भी सर्वाधिक वही उपलब्ध होंगे जिसके लिए देश में हजारों किलोमीटर का सफर करके श्रमिक ट्रेनों में जानवरों की तरह लद कर इन महानगरों में रोजगार की तलाश में पहुंचते हैं यहां कुछ इस तरह की परिस्थितिया होती है कि वे विकल्पहीन होकर उद्योगपतियों से अपनी मजदूरी दर का उचित मोल भाव भी नहीं कर पाते हैं।

इस तरह पूंजीपतियों को औने पौने दाम पर हर टाइप के श्रमिक एक ही स्थान पर मिल जाते हैं जिसके बल पर वे मोटा मुनाफा कमाते हैं इसके परिणाम स्वरुप दूसरी ओर खेतों में काम करने के लिए श्रमिकों की कमी होने से गांवो में भी मजदूरी दर बढ़ जाती है जिसके कारण किसानों के फसलो की उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। अंततः उन्ही शहरी और देहाती मजदूरों को ऊचे दर पर राशन खरीदना पड़ता है और इसके अलावा वे ही श्रमिक, मजदूर इन महानगरों की मलिन गंदी बस्तियों में रहने को मजबूर हो जाते हैं जिसके कारण श्रमिकों के लिए ही सड़क बिजली, पानी, स्वास्थ्य,आवास और ट्रैफिक जाम की समस्या उत्पन्न हो जाती है जिसका भुगतान अंततोगत्वा इन्हीं श्रमिकों को ही करना पड़ता है।

और इन्हीं गरीब श्रमिकों की सेवा के नाम पर सरकार बिजली, सड़क, पुल,अस्पताल जैसी बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए और निवेश करती है जबकि यह निवेश भी अप्रत्यक्ष रूप से पूंजीपतियों की ही सहायता ही होता है ना की गरीबों का क्योंकि यदि ऐसा नहीं होगा तो श्रमिक अपने गांवो को लौट जाएंगे और सारे उद्योग ठप्प हो जाएंगे।

चुकी सबसे अधिक उपभोक्ता इन्हीं महानगरों में उपलब्ध होने से मुख्य व्यापारिक केंद्र भी इन महानगरों में ही सिमट जाता है जिससे किसानों को अपनी फसल की वाजिब कीमत पाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर का सफर कर के इन बाजारों में अपनी फसल लेकर जानी पड़ती है और इतनी परिवहन लागत चुका कर पहुंचा किसान अपनी फसल की कीमत का उचित मोल भाव न कर पाने के लिए मजबूर होता है वरना उसे और उतना भाड़ा लगाकर उसे अपने घर ले जाना पड़ेगा इसलिए किसान को अपनी फसल औने-पौने दाम में ही बेचनी पड़ जाती हैं।

अब सवाल बनता है कि इसका समाधान क्या है ?

देश की अधिकांश पूंजी को कुछ महानगरों में निवेश कर दिया जाता है तो सारी सुविधाएं इन्हीं महानगरों तक सिमट जाती हैं जिससे लोग रोजगार के लिए सैकड़ों किलोमीटर सफर करके आने को मजबूर होते हैं पर यदि उसी पूंजी को कई भाग में देश में कई सारे चुनिंदा छोटे-छोटे शहर विकसित करने में निवेश कर दिया जाए तो प्रत्येक क्षेत्र में अपना एक बाजार होगा तथा साथ ही रोजगार के साधन भी वही उपलब्ध हो जाएंगे।

इससे परिवहन लागत बचने और जीवन यापन होने वाली दैनिक परेशानियों का निपटान भी हो जाएगा इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण लाभ और भी हैं जैसे कि यदि किसी व्यक्ति की सैलरी₹100000 हैं फिर भी वह पांच ही रोटी खाएगा और अगर उसी ₹100000 रुपए में 10 लोगों 10, 10 हजार सैलरी दिया जाए तो वे 50 रोटियों की डिमांड करेंगे। इस प्रकार विकेंद्रित पूंजी निवेश केंद्रित पूंजी निवेश से कहीं अधिक रोजगार उपलब्ध कराती है।🤗🤗🤗🤗🤗🤗

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मोहम्मद गौरी और नोटबंदी

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कौन कहता है कि नोटेबंदी फेल हो गई इसे जबरजस्त सफलता मिली है अरे भाई जिस मकसद से हुई थी वह तो पूरा हो ही गया।
जब मोहम्मद गोरी ने भारत पर विजय प्राप्त की तो उसने अपने एक गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया और सारा शासन उस के माध्यम से अपने देश से ही नियंत्रित करता रहा।
आज भी भारत में स्थिति ठीक वैसी ही है यहां सरकारे सेल्फ कंट्रोलड नहीं बल्कि मार्केट कंट्रोलड होती हैं
एक बार एक चलती बस को ड्राइवर ने अचानक रोक दिया की बस में कुछ चोर सवार है पहले इनको उतारेंगे उसके बाद ही बस आगे बढ़ेगी।
हालाकि अचानक लगे इस झटके से कई सवारियों के दांत टूट गए तो कइयों के हाथ पाव टूट गए जिसे ड्राइवर ने नेकी की प्रसव पीड़ा करार देकर पल्ला झाड़ लिया।
यहां आप ड्राइवर को गलत समझ रहे है बल्कि वो तो ड्यूटी पूरी निष्ठा से कर रहा है दरअसल पहले यह ड्राइवर एक अस्पताल में बहाल हुआ था जब अस्पताल वालों का व्यापार में मोटा मुनाफा कम हो गया तो उन्होंने दूसरे विभागों में हाथ आजमाया और अपने इस काबिल आदमी को परिवहन विभाग में ड्राइवर स्पॉन्सर कर दिया,
चूकी ड्राइवर के असली मालिको की ही अस्पताल और गेराज की दुकान थी तो अब ड्राइवर जितना तोड़फोड़ मचाता उस हुई जान और माल की मरम्मत ड्राइवर के असली मालिको के अस्पताल और गेराज में होती तो बाहर से यहां जो हमे घाटा और नासमझी दिख रहा था असल में किसी का फायदा है।

  • यहां नोटबंदी में भी हुआ कुछ यूं ही काला धन हटाने के नाम पर देश के ड्राइवर ने अर्थव्यवस्था से सारी नकदी को बैंकिंग प्रणाली में मंगा ली क्योंकि बैंकिंग व्यवस्था में अगर आप 100 रूपए जमा करते हैं तो बैंक 1000 रुपए से भी अधिक का लोन बाजार में जारी कर सकते है।
  • तो यह नोटबंदी पूंजीपतियों को और ज्यादा लोन देने के लिए जनता से नकदी बैंक में मंगाने का एक प्रयास मात्र था।
    तो आप क्या सोचते हैं कि प्रधान सेवक आप से कहेंगे कि भाइयों और बहनों कुछ महीने आप लाइन में लग जाओ आपके पैसे मुझे गिफ्ट में देने है स्वाभाविक है वह कुछ ना कुछ कहेंगे।
  • मुख्य कारण यह था कि बैंकों के बढ़ते एनपीए की वजह से उनके पास साख सृजन यानी लोन बाटने की क्षमता कम हो गई थी और देश में अतिरिक्त पैसा सृजन का उपाय तो था नहीं सो अब अगर ये विदेशो से लोन लेते तो कभी न कभी इन्हे चुकाना पड़ता और यहां तो चिरकाल तक सरकार अपनी ही रहेगी सो बाद में उस लोन को एनपीए घोषित कराकर माफ करा लेंगे।
  • इसलिए इस कॉर्पोरेट मीडिया, सरकार, विपक्ष सब ने मिलकर इसे राष्ट्र सेवा घोषित कर दिया और लोगों का विश्वास और धैर्य बंधाय रखने में सफल हुए क्योंकि यह सभी पक्ष स्टेकहोल्डर थे।
    अंततः यह सभी कमोबेश इससे लाभान्वित होने ही वाले थे सो उन्होंने मिलकर रोना-धोना, गाना सारे तिकड़म अपनाएं।
  • इनकी सफलता और यहां के नागरिकों को देखकर हमें यह अहसास होता है कि अगर उसी इंग्लैंड से पढ़कर आए हुए स्वतंत्रता सेनानी नहीं होते तो अंग्रेज, फ्रेंच 400 साल और यहां शासन करके जाते।
  • नोटबंदी का दूसरा मकसद था पूरी तरह से नकदी से संचालित इस खुदरा बाजार की कमर तोड़कर उसे पिछड़े इलाकों तक ही सिमित करना ताकि कमाऊ खुदरा बाजार के लिए मैदान सपाट हो जाए जिससे अमेज़न, फ्लिप्कार्ट और तमाम ब्रांडेड स्टोर्स के लिए फलने-फूलने का मौका उपलब्ध हो सके।
  • हालाकि बड़े पैमाने पर व्यापार से पैमाने के लाभ मिलते है क्योंकि उत्पादन के साधनों की कुशलता बढ़ने से उत्पादन लागत कम हो जाती है जिससे संसाधनों की बरबादी कम तो होती है लेकिन ऑर्गेनाइज सेक्टर में ये सारा फायदा सिर्फ किसी एक या दो निजी कंपनियों को मिल जायेगा है जो इस पूंजी को वह अपने फायदे के हिसाब से निवेश करेंगे या विदेशी में तुलनात्मक लाभ के आधार पर निवेश करेंगे ना कि समाज कल्याण के लिए।
  • और वैसे भी इस देश में मानव संसाधन की कोई कमी तो है नहीं इसलिए अव्यवस्था के कारण जो बरबादी होती है वो अफोर्डेबल है क्योंकि व्यवस्थित खुदरा बाजार की अपेक्षा यहां कही ज्यादा रोजगार सृजन होता था।
    हालाकि यह समस्या किसी एक प्रधान सेवक या सरकार की नहीं है ये तो सिर्फ एक ऑन सेल उपलब्ध पेशेवर लोगो की जमात है जो पूरी तरह प्रोफेशनल है और ये लोग किसी के रिश्तेदार नहीं होते और इन्हें हायर किया जाता है ।
  • यहां राखी सावंत का कथन चरितार्थ होता है कि वह छोटे कपडे पहन कर डांस करके कोई गुनाह नहीं करती बल्कि अगर मना करती है तो फिर वे ही छोटे कपडे को पहन कर उसी आईईटम सॉन्ग पर नाच रहा होता फिर करियर में आगे बढ़ने के इस सुनहरे अवसर को वह क्यों गवाए।
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संगती का महत्व

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अपनी संगति और संबंधों को लेकर सचेत होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी समुदाय की पहचान दरअसल उसकी बहुसंख्यक सदस्यों के गुणों आधारित होती है तब किसी एक दो सदस्यों के गुण और दोष अप्रासंगिक हो जाते हैं।

जैसे कुछ ऐसे बेहद कुख्यात टर्म्स है असंतोष, घमंड, लालच,भय ये शब्द संभवतः सिर्फ इसीलिए नकरात्मक सेंस देते हैं क्योंकि इनका उल्लेख अक्सर नकरात्मक एवं अपराधिक प्रसंगों में होता है फलस्वरुप इनके सकरात्मक गुण अप्रासंगिक हो गए हैं।

जैसे –
असंतोष– एक पल को मान लीजिए कि कोई विद्यार्थी संतुष्ट हो जाए, या कोई उद्यमी, कलाकार या रचनाकार अपनी योग्यताओं को लेकर संतुष्ट हो जाए तो संभव है इन सभी का अस्तित्व समाप्त जाए।

घमंड– हालांकि यह पूरी तरह से नकरात्मक तासीर धारण किए हुए है किंतु क्या होगा अगर कोई विद्यार्थी अपनी घंटों की मेहनत से प्राप्त नतीजे पर स्वयं को विशिष्ट महसूस ना करें?
फिर उस विद्यार्थी को आगे कुछ करने का आत्म बल और प्रेरणा कहां से मिलेगी?
लालच– सोचिए अगर हमें सुनहरे भविष्य के प्रति आकर्षण एवं लालच का भाव ना हो तो हम परिश्रम क्यों करेंगे, अगर किसी सन्यासी को संसार से वैराग्य होने के बावजूद अगर उसे मोक्ष और ईश्वर प्राप्ति का लालच ना हो तो फिर वह क्या करेगा?
भय– अगर हमें परीक्षा में असफल होने का भय न हो तो फिर हम परिश्रम क्यों करेंगे?
अगर हमें दंड भरने का भय ना हो तो हम ट्रैफिक नियमों का पालन क्यों करेंगे?
यदि सजा का भय ना हो तो कितने लोग सदाचार का पालन करेंगे?

:यह तमाम उद्धरण यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि कैसे किसी भी गलत समूह में शामिल होने मात्र से आपके गुण अस्तित्वहीन हो जाते हैं।
हालांकि यदि आपका व्यक्तित्व एवं योग्यता इलायची के समान किसी भी व्यंजन को अपने सुगंध और स्वाद से आच्छादित करने में सक्षम हो तो फिर आप बेशक किसी भी विख्यात या कुख्यात समूह का हिस्सा होने का जोखिम वहन कर सकते हैं।